सुनो, बन चुकी हूँ मैं वो दरख़्त,
जिसके नीचे हम मिला करते थे ,
औ जहाँ छोड़ तुम मुझे चल दिए थे,
हो के सवार अपनी फटफटिया पे।
मैं पीछे और पीछे छूटती जा रही थी,
और तुमने न देखा पलट के कभी,
तो अब क्यों देते हो इल्जाम कि ,
मैं गयी तुम्हे भूल
जबकि मैं तो वहीँ हूँ , आज भी ,
बन के दरख़्त वही।
शुक्रवार, 27 नवंबर 2015
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
काश
जाने कैसे लोग होते हैं जिन्हें कोई regret कोई पछतावा नहीं होता। इतना सही कोई कैसे हो सकता है कि कुछ गलत न हुआ हो कभी भी उसकी जिंदगी में। अब...
-
चांद मुझे तुम सा लगता है, तुम सा ही लुभावना, अपनी ही कलाओं में खोया, तुम्हारी मनःस्थिति सा कभी रस बरसाता तो कभी तरसाता कभी चांदनी से सराब...
-
कभी देखें हैं बोन्साई खूबसूरत, बहुत ही खूबसूरत लड़कियों से नही लगते? छोटे गमलों में सजे जहां जड़ें हाथ-पैर फैला भी न सकें पड़ी रहें कुंडलियों...
-
एक बार माता-पिता बन जाने के बाद आप कोई भी चीज अपने लिए नहीं लेते | सब कुछ बच्चों के लिए ही लिया जाता है | ऐसे ही एक दिन हमारे यहाँ क...
👌👌👌shabdon ki kami lag rahi aaj tareef k liye
जवाब देंहटाएं👌👌👌shabdon ki kami lag rahi aaj tareef k liye
जवाब देंहटाएं