सुनो, बन चुकी हूँ मैं वो दरख़्त,
जिसके नीचे हम मिला करते थे ,
औ जहाँ छोड़ तुम मुझे चल दिए थे,
हो के सवार अपनी फटफटिया पे।
मैं पीछे और पीछे छूटती जा रही थी,
और तुमने न देखा पलट के कभी,
तो अब क्यों देते हो इल्जाम कि ,
मैं गयी तुम्हे भूल
जबकि मैं तो वहीँ हूँ , आज भी ,
बन के दरख़्त वही।
शुक्रवार, 27 नवंबर 2015
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काश
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👌👌👌shabdon ki kami lag rahi aaj tareef k liye
जवाब देंहटाएं👌👌👌shabdon ki kami lag rahi aaj tareef k liye
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