रेत सी बन जियूं तो क्या अच्छा हो,
हर सुख, हर दुःख
लहरों सा धो के निकल जाए
कभी आप्लावन से भर उठूँ
दरक जाऊं प्रवाह में,
उतरने के बाद फिर नई,
अनछुई सी, स्वागत को तैयार रहूँ
अनजानी सी लहर के,
या किसी के पैरों के निशान सहेजूँ,
औ किसी बच्चे के सपनों को
घरौंदे में बदलने को आतुर रहूँ
हर आगत पल की
अनिश्चितता, रोंगटे खड़े करे मेरे
जीवन के हर पल में रोमांच
नया सा, कैसा तो होता होगा ना ?
गुरुवार, 22 सितंबर 2016
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
काश
जाने कैसे लोग होते हैं जिन्हें कोई regret कोई पछतावा नहीं होता। इतना सही कोई कैसे हो सकता है कि कुछ गलत न हुआ हो कभी भी उसकी जिंदगी में। अब...
-
चांद मुझे तुम सा लगता है, तुम सा ही लुभावना, अपनी ही कलाओं में खोया, तुम्हारी मनःस्थिति सा कभी रस बरसाता तो कभी तरसाता कभी चांदनी से सराब...
-
कभी देखें हैं बोन्साई खूबसूरत, बहुत ही खूबसूरत लड़कियों से नही लगते? छोटे गमलों में सजे जहां जड़ें हाथ-पैर फैला भी न सकें पड़ी रहें कुंडलियों...
-
जाने कैसे लोग होते हैं जिन्हें कोई regret कोई पछतावा नहीं होता। इतना सही कोई कैसे हो सकता है कि कुछ गलत न हुआ हो कभी भी उसकी जिंदगी में। अब...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें