रविवार, 18 दिसंबर 2016

कैशलेस इकॉनमी
8 नवम्बर से शुरू हुई नोटबंदी कुछ इस तरह काले धन से होते हुए कैशलेस इकॉनमी यांनी कि नोटरहित अर्थव्यवस्था पर आ कर रुकी जैसे कोई बहू बच्चे को सास के सुपुर्द कर कमला से मिलने निकले और कमला के न मिलने पर विमला, शीला, सुशीला से मिल कर लौटे। खैर, जब कैशलेस अर्थव्यवस्था की चर्चा जोर शोर से चलने लगी तो हमने भी सोचा हम भी किसी से इस बारे में चर्चा कर खुद को ज्ञानी मानने का सुख पाएं | अब किसी एक्सपर्ट से तो बात करने का कोई फायदा नहीं जहाँ चर्चा में अपन कुछ ज्ञान बघार ही न सकें | इसलिए कुछ ऐसे लोगों से बात करनी चाहिए जिन्हें हम कुछ उपदेश पिला सकें | अब हमने आठ-दस अखबार, पत्रिकाओं और न्यूज़ चैनलों की बहसों से खुद को अपडेट किया और आंकड़े लाद के रवाना हुए |
निकलते ही सबसे पहले अपनी सोसाइटी के बूढ़े चौकीदार से सामना हुआ | हमने उनसे पूछा, बाबा कैशलेस इकॉनमी समझते हो ? उसने पूछा ये क्या है ? अब पहले उसे समझाने का जिम्मा लादा और कहा कि कैशलेस माने कैश के बिना काम चलाना | सुन के उसने अपने सर के बचे खुचे बाल खुजाये और कहा, उससे क्या होगा? हमने तपाक से देश वाला कार्ड खेला, काहे से कि ये तो कभी फ्लॉप होता नहीं है, और कहा कि देश का भला होगा, आप देश के लिए इतना नहीं कर सकते ? देश सुनते ही उन्होंने सर खुजाना बंद किया और सोचने लगे | फिर बोले, बाबू आप कहते हो तो ठीक ही होगा, लेकिन अब ये चार बाल ही तो बचे हैं | इनसे भला क्या भला होगा देश का | जवानी में कहा होता तब बताते, तब क्या घने केश हुआ करते थे | मेरे से ज्यादा तो आप भला कर सकते हो देश का | इतना सुनते ही हम खिसियानी हंसी हंस कर अपने शानदार घने केशों को संभालते हुए वहां से सटक लिए | थोड़ी देर और रुकते तो सर मुंडवाने की नौबत आई जानी थी | 
आगे बढे तो एक सजी-धजी महिला दिखीं | हमने उनसे सवाल दाग दिया | वो इतनी जोर से चौंक पड़ीं कि हम घबराए कि हमने कहीं उनकी उम्र तो नहीं पूछ ली | वे हैरान हो कर पूछ बैठीं कि कैशलेस कैसे होगा | हम उत्साहित हुए कि प्रवचन का मौक़ा आया | वे फिर बोल पड़ीं कि ऐसे तो नोट फट जाएगा | वैसे भी नए नोट का कागज कितना खराब है | ऊपर से उसमे लेस लगवाएंगे तो कैसे होगा | चलो मान लिया कि आजकल मशीनों से सब संभव है | लेकिन बताओ सिक्कों का क्या करेंगे | उसपर कैसे लेस लगायेंगे | और वो भी हर कोई अलग अलग | अब सिलाई किये एक जमाना हो गया | ब्लाउज तो दर्जी के यहाँ डालते, अब नोट पर खुद कैसे करेंगे | हमने इतना सुनके अपना सर पकड़ लिया और वहां से निकल लिए |
अब हमारी हिम्मत जवाब दे चुकी थी तो घर वापस चलने का निश्चय किया | घर लौटते हुए सब्जी लेते हुए वापस आने का फरमान याद आया | सब्जियां ले कर तिरेपन रूपये के पेमेंट के लिये पर्स टटोलते हुए देख कर सब्जी वाला बोला, साब पेटीएम कर दो | हमें हैरान होता देख कर बोला, साब जीना है तो सब सीखना पड़ता है | हमने उस से कैशलेस इकॉनमी के बारे में उसकी राय जाननी चाहि तो बोला इतना तो “कैश” लेस हो गया अब और क्या बचा कैशलेस में | हम तो बाबूजी सड़क पर घूमती आवारा गाय हैं जिसे खिलाने पिलाने की जिम्मेदारी भले ही कोई भी न ले लेकिन दुहने के लिए हर कोई हमेशा तैयार रहे | और हम चुपचाप यह सोचने लगे कि लोकतंत्र में आज जनता ही गाय है |

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

बुलेट ट्रेन का इन्तजार करते हुए

   सुना है अब सच ही बुलेट ट्रेन आ रही है | हालांकि बहुत दिनों से इसके आने के हल्ले थे लेकिन अपने यहाँ कोई आते-आते आ जाए तब ही उसे आया मा...