सोमवार, 18 सितंबर 2017

मैं खरा बोलता हूँ,
यही थी राय सबों की मेरे बारे में
कड़वा न कह बस खरा कह
अपने कहे को मृदु बनाते थे लोग,
खरा न सह पाने के कारण
दूरी बनाते थे मुझसे लोग,
क्या करता मैं?
मिठास कहाँ से लाता
जब मीठे बोलों के लिए था खुद ही था तरसा
मीठे बोलों में छुपे आकंठ गरल
से बचने को तड़पा
नमक ही था भरा, बोली में
नमक, जो था मेरे पसीने की कमाई
मुझे घर बैठा के किसी ने रोटी न थी खिलाई
वही सूखे पसीने की धार 
है मेरी जुबां पे उग आई
अब नमक को चाशनी में कैसे घोलूँ
बताओ भला, मैं सच कैसे बोलूँ?

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