शनिवार, 8 जुलाई 2017

जी.एस.टी. के जलवे



सरकारें सता में आतीं है | सरकारें नई योजनायें बनातीं हैं | फिर सरकारें उन योजनाओं को लागू करवाती हैं | इसमें कुछ योजनायें लागू होतीं हैं कुछ नहीं | योजनायें दरअसल सरकारों के बच्चे होते हैं | इसीलिए वो उन्हें बहुत प्रिय भी होतीं हैं | अब जैसे बहुत से बच्चों में से कोई बच्चा ज्यादा तेज होता है कोई जरा कम और कोई तो बिलकुल नाकारा | उसी तरह योजनाओं में से कोई टिंच होती है कोई फुस्स | जिसमें खाने-कमाने के अवसर ज्यादा हों वो टिंच और जिसमे कम हों वो फुस्स | लेकिन ऐसी कोई योजना आज तक नहीं बनी जिसमे कोई अवसर हो ही नहीं | सरकारें घाटे का कोई काम नहीं करतीं | जिस प्रकार नालायक बच्चा भी जूते गाँठ के घर में चवन्नी ले ही आता है, वैसे ही हर एक योजना किसी न किसी का भला तो करती ही है | अब ये और बात है कि जिसका भला करने की कोशिश की गयी हो उसके बजाय किसी और का भला हो गया हो | और सरकार का भला तो सबसे होता ही है |
कई बार ऐसा भी होता है कि कोई योजना किसी और सरकार ने शुरू की लेकिन वो पूरी होते-होते सरकार बदल जाती है | फिर बदली हुई सरकार उस योजना का नाम बदला कर उसे अपने नाम कर श्रेय ले लेती है | यह कुछ ऐसा ही है जैसे राह चलते किसी बच्चे को गोद लिया जाए और उसे अपना नाम दे कर पुण्य कमाया जाए | हालांकि आजकल इस पर बहुत तकरार होने लगी है कि फलां योजना अमुक नेता ने शुरू की थी इसलिए वो अमुक नेता की हुई | लेकिन खुद ही बताइए जो नेता वापस सत्ता में न आ सके उस नेता के नाम योजना कर उसका भाव क्यों गिराना | वैसे भी इतिहास गवाह है कि नाम तो जीतने वाले का ही होता है | शिलालेख तो उसी का लगता है | अभी तक ऐसा सड़क, पुल वगैरह में हुआ करता था, फिलहाल अब ऐसा जी.एस.टी. में भी हुआ है |
विपक्ष कह रहा है कि ये जी.एस.टी की स्कीम वे लाये थे और तब के विपक्ष जो अब सत्ता में हैं, ने इसका पुरजोर विरोध किया था | उनके इसी विरोध के कारण हम ये नहीं ला पाए थे | अब आज के सत्ता पक्ष उन्हें  अंगूठा दिखाते हुए कह रहे हैं कि हमारी जी.एस.टी. नई-नवेली है | आपके जी. एस.टी. में वो फीचर नहीं हैं जो हम ले के आये हैं | हमने इसमें बाय वन, गेट थ्री की तर्ज पर चार स्लैब बनाये हैं | अब जब आप कुछ भी खरीदने जायेंगे, आप यह तो पता कर ही लेंगे कि उस वस्तु पर कितने प्रतिशत टैक्स है | साथ ही आपका अच्छा ख़ासा रिवीजन भी हो जाएगा कि कौन सी वस्तु कितने प्रतिशत टैक्स के दायरे में है | इस तरह पूरी जनता की याददाश्त दुरुस्त रहेगी | इसके साथ ही जी.एस.टी. से सरकार पर पैसों की भरमार हो जायेगी जो आप ही का भला करने के लिए नई योजनाओं को बनाने में खर्च की जायेगी |
योजनाओं को चलाने के लिए पैसों की जरुरत पड़ती है | योजनायें सिर्फ जबानी जमाखर्च से नहीं चलतीं | सरकार के नुमाइंदे भले ही योजनाओं में से करोड़ों रूपये कमा लें लेकिन योजनाओं में लगाने के लिए धन हमेशा कम ही रहता है | इस कमी को पूरी करने के लिए सरकार टैक्स लगाती है | टैक्स वो रकम है जो सरकार जनता से उसकी भलाई के कामों में लगाने के लिए जबरिया लेती है | मतलब कुछ यूँ कि अपना बायाँ कान अपने बायें हाथ से न पकड़ कर दाहिने हाथ से पकड़ना | सरकार इस प्रकार जनता के कान पकड़ती है कि उसे पता ही नहीं चलता कि कान पकडे भी गए हैं | उसे पता तब चलता है जब कान खिंचने शुरू होते हैं | अब जनता तो जनता ही है उसकी क्या मजाल जो अपने कान छुड़ा ले | कान तो खिंचने ही  हैं | जनता के हाथ में सिर्फ यही प्रार्थना करना है कि कान जरा कम जोर से खिंचें |  
ये कुछ ऐसे ही है जैसे अब नए लागू हुए जी एस टी में टैक्स की अलग-अलग दरों से पता चल रहा है कि अब तक उसके कान कहाँ-कहाँ और कैसे-कैसे खींचे जा रहे थे | अब वो बेचारी सकपकाई सी खड़ी है | उसे समझ में नहीं आ रहा है कि वो रोये कि अब तक वो कितनी तरह के कितने ज्यादा टैक्स दे रही थी या खुश हो अब उसे कम टैक्स देना पडेगा | उस समझ में आये भी तो कैसे भला, जब उसे समझाने को उतारू बैठे एक से एक विशेषज्ञों की समझ में कुछ नहीं आ रहा | सभी खुद को सही मान रहे | सभी विशेषज्ञ अपने तर्कों से एक दूसरे की बोलती बंद कर रहे हैं और आपस में इस तरह लड़े जा रहे हैं कि लगता है विश्व युद्ध इसी मुद्दे पर होगा कि जी.एस.टी. देश के लिए अच्छी साबित होगी या बुरी |
अब जो हमने जी.एस.टी. पर इतना लिख मारा है तो एक शंका सर उठा रही है कि कहीं लिखना भी टैक्स के दायरे में न आ चुका हो | और जो सच्ची आ ही गया हो तो वो कौन सी  स्लैब में रखा गया है ? हम इतना टैक्स देंगे कहाँ से ? इन सब सवालों के जवाबों के लिए हमें किसी सस्ते से सी.ए. को खोजना पडेगा | आप लोग अपनी देखिये | जय राम जी की |

शनिवार, 1 जुलाई 2017

ब्लॉग का पुनरुद्धार



एक बार माता-पिता बन जाने के बाद आप कोई भी चीज अपने लिए नहीं लेते | सब कुछ बच्चों के  लिए ही लिया जाता है | ऐसे ही एक दिन हमारे यहाँ कंप्यूटर लिया गया | बच्चों की पढ़ाई के लिए | फिर बच्चों पर नियंत्रण रखने के लिए इसे सीखा भी गया, क्योंकि हम दोनों ही तब इस विधा में अंगूठाटेक थे | अब जब सीख ही लिया तो गृहस्थी से बचे समय में इस पर हाथ आजमाना भी शुरू कर दिया गया | उन दिनों तो ये हाल था कि जहाँ भी “क्रिएट एन अकाउंट” देखते, वहां फटाक से अकाउंट बना भी लेते | ऐसे ही एक दिन ब्लॉग भी बना |
अब ब्लॉग बन गया तो उसमे क्या लिखा जाए यह प्रश्न खड़ा हुआ | थोड़ी रिसर्च की तो पता चला कि इसमें जो मन आये वो लिख सकते हैं | अब हमने बहुत मन बनाया लेकिन फिर भी बहुत दिनों तक ये समझ भी नहीं आया कि आखिर लिखा क्या जाए | इस कारण ये ब्लॉग लम्बे समय तक कुम्भकर्णी निद्रा में ही पड़ा रहा | उधर फेसबुक धड़ल्ले से चल ही रही थी | इस दौरान हम डेस्कटॉप से स्मार्टफोन तक का सफ़र भी तय कर चुके थे और थोड़े-थोड़े समय के बाद हमें लगता था कि ब्लॉग को जगाया जाए |
इस प्रकार, नवम्बर २०१५ में हमने आखिरकार डरते-डरते इस पर कुछ न कुछ पोस्ट करना शुरू किया | ये हमारे लिए एक डायरी सरीखा था जिसे कुछ करीबी दोस्तों के अतिरिक्त सबसे छिपा कर रखा था | इसलिये कभी इसकी लिंक भी शेयर नहीं की | बीच-बीच में हम इस पर पोस्ट करना भूल भी जाते रहे | आज प्रथम अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लॉगिंग दिवस पर अनेक मित्रों के ब्लॉग दिखे और पढ़े भी | उनसे प्रेरणा पा कर हमने भी फिलहाल निश्चय किया कि अब ब्लॉग पर नियमित हुआ जाए | अब देखना ये है कि ये संकल्प हम कब तक निभा पाते हैं |
जय ब्लॉगिंग |  

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

दीवारें बोलती हैं
बचपन से हम एक मुहावरा सुनते आये हैं कि दीवारों के भी कान होते हैं | सुनते आये हैं तो सही ही होगा क्योंकि हम सुनी-सुनाई बातों पर वैसे भी जल्द ही यकीन कर लेते हैं | अब ये सोचिये कि अगर सुन सकतीं तो इतना सब सुन के अपने अन्दर कहाँ तक दबाये रखतीं तो बहुत लाजमी है कि वे बोलतीं भी | तो सोचिये कि गर दीवारें बोलतीं भी तो क्या होता | न, वो पेंट के विज्ञापन सरीखी नही कि फलाना पेंट लगाओ तो  दीवारें बोल उठेंगी | हमारे आपकी तरह सचमुच का बोल सकतीं |
तब हर दीवार खुल के बोल सकती | अपना इतिहास बता सकती कि कब कहाँ, किसने, कितनी लागत से, कितनी ईंटों और कितने सीमेंट से उसे बनाया | तब तो तमाम घपलों घोटालों की गुंजाइश ही ख़तम हो जाती | ठेकेदारों का बड़ा नुकसान हो जाता | और तो और बेचारे गाइडों के पेट पे लात पड़ जाती | तब अकबर अनारकली को दीवार में चुनवाने की सजा नहीं दे पाते | उन्हें कोई  और सजा ईजाद करनी पड़ती, क्योंकि दीवाल पहले ही बोल कर भन्डाफोड़ कर देती | हो सकता है अदालत में दीवालों को गवाही के लिए भी बुलाया जाता | पर दीवारों के पैर नहीं होते, बस इसीलिए ये होते –होते रह जाता |
ऐसा नहीं कि सिर्फ हमसे ही बात करतीं, अकेले होने पर बोरियत होने पर आपस में गपिया भी सकतीं |  फिर ऐसा भी होता कि जिस दीवाल की मरम्मत या रंग रोगन हो जाता वो खुद को दीवारों का नेता समझने लगती | शेष दीवारें उससे बचा के धीमे-धीमे उसकी कुचर्चा भी कर लेतीं | बाहरी दीवाल और भीतरी दीवाल में क्लास कनफ्लिक्ट भी होता | बाहरी दीवाल खुद को एलीट क्लास समझ कर भीतरी दीवारों को मुंह न लगाती | बोल सकने पर गा पाना भी संभव होता | मन न लगने पर दीवारें भी अन्ताक्षरी खेल सकतीं |  
सबसे अधिक मुसीबत बेचारे प्रेमी जोड़ों को आती | घरवालों, नाते-रिश्तेदारों से छुपते-छुपाते, जैसे-तैसे कर मिलने पहुंचे प्रेमी जोड़े अब दीवारों के खौफ में भी जीते कि पता नही कब कौन सी दीवाल ने उन्हें एक साथ देखा हो और कब वो सबके सामने उनकी चुगली कर दे | उनकी इस मुसीबत के कारण ही हमने अपने इस आईडिया पर आविष्कार करने का विचार त्याग दिया वरना हम इस तकनीक का पेटेंट भी करा चुके होते | तो अब दीवारों के बोलने को रद्द समझते हुए उनके चुपचाप सुनने की विशेषता पर ही विश्वास बनाये रखते हैं | शायद भविष्य में कभी हम ऐसा समाज बना पाने में सक्षम हुए जब हमें दीवारों से डरने की जरुरत न पड़े, तब तक के लिए दीवारों का  बोलना मुल्तवी समझा जाए |


रविवार, 18 दिसंबर 2016

कैशलेस इकॉनमी
8 नवम्बर से शुरू हुई नोटबंदी कुछ इस तरह काले धन से होते हुए कैशलेस इकॉनमी यांनी कि नोटरहित अर्थव्यवस्था पर आ कर रुकी जैसे कोई बहू बच्चे को सास के सुपुर्द कर कमला से मिलने निकले और कमला के न मिलने पर विमला, शीला, सुशीला से मिल कर लौटे। खैर, जब कैशलेस अर्थव्यवस्था की चर्चा जोर शोर से चलने लगी तो हमने भी सोचा हम भी किसी से इस बारे में चर्चा कर खुद को ज्ञानी मानने का सुख पाएं | अब किसी एक्सपर्ट से तो बात करने का कोई फायदा नहीं जहाँ चर्चा में अपन कुछ ज्ञान बघार ही न सकें | इसलिए कुछ ऐसे लोगों से बात करनी चाहिए जिन्हें हम कुछ उपदेश पिला सकें | अब हमने आठ-दस अखबार, पत्रिकाओं और न्यूज़ चैनलों की बहसों से खुद को अपडेट किया और आंकड़े लाद के रवाना हुए |
निकलते ही सबसे पहले अपनी सोसाइटी के बूढ़े चौकीदार से सामना हुआ | हमने उनसे पूछा, बाबा कैशलेस इकॉनमी समझते हो ? उसने पूछा ये क्या है ? अब पहले उसे समझाने का जिम्मा लादा और कहा कि कैशलेस माने कैश के बिना काम चलाना | सुन के उसने अपने सर के बचे खुचे बाल खुजाये और कहा, उससे क्या होगा? हमने तपाक से देश वाला कार्ड खेला, काहे से कि ये तो कभी फ्लॉप होता नहीं है, और कहा कि देश का भला होगा, आप देश के लिए इतना नहीं कर सकते ? देश सुनते ही उन्होंने सर खुजाना बंद किया और सोचने लगे | फिर बोले, बाबू आप कहते हो तो ठीक ही होगा, लेकिन अब ये चार बाल ही तो बचे हैं | इनसे भला क्या भला होगा देश का | जवानी में कहा होता तब बताते, तब क्या घने केश हुआ करते थे | मेरे से ज्यादा तो आप भला कर सकते हो देश का | इतना सुनते ही हम खिसियानी हंसी हंस कर अपने शानदार घने केशों को संभालते हुए वहां से सटक लिए | थोड़ी देर और रुकते तो सर मुंडवाने की नौबत आई जानी थी | 
आगे बढे तो एक सजी-धजी महिला दिखीं | हमने उनसे सवाल दाग दिया | वो इतनी जोर से चौंक पड़ीं कि हम घबराए कि हमने कहीं उनकी उम्र तो नहीं पूछ ली | वे हैरान हो कर पूछ बैठीं कि कैशलेस कैसे होगा | हम उत्साहित हुए कि प्रवचन का मौक़ा आया | वे फिर बोल पड़ीं कि ऐसे तो नोट फट जाएगा | वैसे भी नए नोट का कागज कितना खराब है | ऊपर से उसमे लेस लगवाएंगे तो कैसे होगा | चलो मान लिया कि आजकल मशीनों से सब संभव है | लेकिन बताओ सिक्कों का क्या करेंगे | उसपर कैसे लेस लगायेंगे | और वो भी हर कोई अलग अलग | अब सिलाई किये एक जमाना हो गया | ब्लाउज तो दर्जी के यहाँ डालते, अब नोट पर खुद कैसे करेंगे | हमने इतना सुनके अपना सर पकड़ लिया और वहां से निकल लिए |
अब हमारी हिम्मत जवाब दे चुकी थी तो घर वापस चलने का निश्चय किया | घर लौटते हुए सब्जी लेते हुए वापस आने का फरमान याद आया | सब्जियां ले कर तिरेपन रूपये के पेमेंट के लिये पर्स टटोलते हुए देख कर सब्जी वाला बोला, साब पेटीएम कर दो | हमें हैरान होता देख कर बोला, साब जीना है तो सब सीखना पड़ता है | हमने उस से कैशलेस इकॉनमी के बारे में उसकी राय जाननी चाहि तो बोला इतना तो “कैश” लेस हो गया अब और क्या बचा कैशलेस में | हम तो बाबूजी सड़क पर घूमती आवारा गाय हैं जिसे खिलाने पिलाने की जिम्मेदारी भले ही कोई भी न ले लेकिन दुहने के लिए हर कोई हमेशा तैयार रहे | और हम चुपचाप यह सोचने लगे कि लोकतंत्र में आज जनता ही गाय है |

सोमवार, 28 नवंबर 2016

मैंने प्रेम लिखा,
तुमने दर्द पढ़ा,
न जाने क्यूँ,
पर जब पढ़ा तो मुझे भी लगा
शायद दर्द ही था लिखा
अब जो मैं दर्द लिखूँ तो प्रेम पढोगे ?
शायद तब
तुम तक पहुँचने का ख्वाब पूरा हो सके ।

नए नोट, पुराने नोट
8 नवंबर की नोटबंदी के एलान से पहले किसी भी बटुए में बड़े और छोटे नोटों के बीच एक वर्ग संघर्ष सा चलता ही रहता था। 1000 और 500 के नोट की एक टोली थी जो 50, 20,10, 5और 1 के नोटों को मुंह नही लगाती थी। ये छोटे नोटों की टोली गरीब बच्चों की हुड़दंगी टोली सी थी जिसे कभी कभी कोई धनाढ्य कंजक जिमाने के लिए बुला लेता था। इनमें से 1 रूपये की कद्र जरूर थोड़ी अधिक थी क्योंकि शादी ब्याह के मौसम में लिफाफों में बड़े नोटों की संगत कुछ देर के लिए मिल जाती थी। उसके बाद उसका फिर वही हाल होता था जो उसके पुराने साथियों का हमेशा होता था। हाँ, 100 रु के नोट की स्थिति कुछ बेहतर थी। वो बड़े नोटों की टोली में बारहवे खिलाडी की तरह था जिसे सिर्फ पानी पिलाने के लिए टीम में रखा जाता है। हाँ, लेकिन छोटों नोटों की टोली में वो सरदार था। उसके आगे सब ऐसे चुप हो जाते थे जैसे शोर मचाते बच्चों की कक्षा में अचानक से मरखोर मास्साब आ जाएं।
     तो जैसे सत्यनारायण की कथा के अंत में कहते हैं न, कि जैसे इसके दिन बदले वैसे सबके बदलें, तो कुछ वैसे ही देवी सरस्वती ने मोदीजी की मति फेर दी,और उन्होंने तत्काल प्रभाव से नोटबंदी का फरमान सुना डाला और छोटे नोटों के दिन बदल गए। देश में जो प्रभाव हुआ सो हुआ, बटुए पे इसका कैसा असर हुआ,वो सोचिये। रातोंरात हर शख्स के बटुए से बड़े नोट निकल गए। उनकी जगह छोटे नोटों ने ले ली। 100 रु का नोट नया सरताज था इस सल्तनत का। उसका हाल तो बिल्ली के भाग से छींका टूटने सा हो गया। लेकिन उसकी ये ख़ुशी ज्यादा दिन की नहीं थी। जल्द ही 2000 के तथा 500 के नए नोट आने का एलान हुआ । फिर से वही वर्ग संघर्ष की लड़ाई की आहट हुई।
        नए नोटों की कमी के कारण सत्ता के उलटफेर का सा मामला बन नही पाया । 2000 का एक नोट 100, 50, 20,10 की टोली में ऐसे अजूबे सा देखा जाता जैसे कोई अप टू डेट विदेशी झोपड़पट्टी पे डाक्यूमेंट्री बनाने आया हो। जैसे गली के बच्चे नयी कार आने पे उसके पीछे भागते और उसका मालिक बच्चों को खदेड़ता रहे ठीक वैसे ही सारे नोट मिल कर बड़े नोट को छेड़ने में लगे और वो अपनी हैरानी परेशानी पे एलीट होने का चश्मा चढ़ाये कोने में अकेला बैठा रहे। सही भी है जब तक अपनी मेजोरिटी न हो बन्दे को चुप रहना चाहिए। ऊपर से अभी 500 के नए नोटों के हमशक्ल का लफड़ा और हो गया। 2000 के नोट को एक साथी की उम्मीद थी जो इन छिछोरे नोटों के विरुद्ध उसका साथ दे, लेकिन हाय री किस्मत।  जिसके बूते पे वो भविष्य की बादशाहत के सपने देख रहा उसकी हालत तो पिटे प्यादे से भी गयी गुजरी निकली। बेचारे 500 के नोट को अपनी हीरो जैसी एंट्री की उम्मीद थी लेकिन कॉमेडियन से भी गयी बीती हालत हो गयी। अब वो कोई उदय चोपड़ा तो है नही जो बार बार लांच हो।
  तो भई फिलहाल 1000 के नोट की हालत टीबी के मरीज जैसी हो गयी है, कोई जिसके पास बैठना भी पसंद नही करता। भले ही सरकार कितने ही विज्ञापन दे ले कि टीबी संक्रामक नही । वैसे ही 1000 का नोट भ्रष्टाचार के आरोप में  पदच्युत नेता सा कालकोठरी में बैठा है।  2000 और 500 के नोट अपनी जमीन तलाश रहे हैं और छुटभैयों की सरकार है ।
बाकी सब मजे में है ।

शनिवार, 26 नवंबर 2016

हम यूँ ही पैदा होते हैं, अचानक
और यूँ ही मर भी जाते हैं,
इस जीने और मरने के बीच का सफर भी होता
यूँ ही, बेवजह सा
बेवजह हँसते, बेवजह खिलखिलाते
बेवजह रोते, बेवजह गुनगुनाते
बेवजह लड़ते, बेवजह मनाते
काश... जी पाते बेवजह

बिना वजह की तलाश किए, 

और यूँ ही गुजर जाती जिंदगी
काश ऐसा हो कभी, यूँ ही

काश

 जाने कैसे लोग होते हैं जिन्हें कोई regret कोई पछतावा नहीं होता। इतना सही कोई कैसे हो सकता है कि कुछ गलत न हुआ हो कभी भी उसकी जिंदगी में। अब...