गुरुवार, 24 नवंबर 2016

सुबह का सूरज,
रात के अधूरे, अधभूले से ख़्वाबों पर
कोमलता से अपना हाथ फेरता है
गुनगुनी धूप में सिंके, ताजा बुने ख्वाब
फिर से पलकों में गुंथ जाते हैं
दिन भर वहीँ छिपे और महकते जाते हैं
रात के इन्तजार में
और चाँद,
चाँद अपनी घटबढ़ में ख़्वाबों को तराशता सा जाता है
ऐसे ही तराशे, अधबुने सपने ले सोती हूँ
पिछली रात से सिरा पकड़ने की कोशिश में
नींद ही गुम जाती है
अधूरा ख्वाब अधूरा ही रह जाता है
एक और अधूरा पन्ना उनमे जुड़ जाता है
रात दर रात ख्वाब की किताब
मोटी होती जाती है
तब किसी दिन अचानक से यूँ ही बीच में से
कहीं से भी खोल लेती हूँ एक सफा
उस दिन उसी ख्वाब को जीती हूँ
आधा-अधूरा ही सही, सपना पूरा कर लेती हूँ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

योग बनाम योगा

और एक बार फिर विक्रम बेताल को अपने कंधे पर लाद चुप रहने का निश्चय कर चल पड़ा | बेताल ने हमेशा की तरह समय बिताने के लिए बातों का सहारा ल...