शनिवार, 26 नवंबर 2016

हम यूँ ही पैदा होते हैं, अचानक
और यूँ ही मर भी जाते हैं,
इस जीने और मरने के बीच का सफर भी होता
यूँ ही, बेवजह सा
बेवजह हँसते, बेवजह खिलखिलाते
बेवजह रोते, बेवजह गुनगुनाते
बेवजह लड़ते, बेवजह मनाते
काश... जी पाते बेवजह
और यूँ ही गुजर जाती जिंदगी
काश ऐसा हो कभी, यूँ ही

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

योग बनाम योगा

और एक बार फिर विक्रम बेताल को अपने कंधे पर लाद चुप रहने का निश्चय कर चल पड़ा | बेताल ने हमेशा की तरह समय बिताने के लिए बातों का सहारा ल...